सोशल मीडिया ताकत है, सत्ता का पैमाना नहीं














आज की राजनीति में सोशल मीडिया महज संवाद का माध्यम नहीं रहा; वह जनमत को प्रभावित करने वाली एक बड़ी शक्ति बन चुका है। कोई मुद्दा कुछ घंटों में देशव्यापी बहस का केंद्र बन सकता है, कोई बयान राजनीतिक तूफान खड़ा कर सकता है और कोई तस्वीर सत्ता के गलियारों से निकलकर सीधे जनता के मोबाइल तक पहुंच सकती है। मगर सवाल यह है—क्या यही डिजिटल हलचल सत्ता की लोकप्रियता का अंतिम पैमाना भी है? शायद नहीं!
हैशटैग की उम्र छोटी होती है, जनता की स्मृति लंबी!सोशल मीडिया पर आज जो विषय आसमान छूता दिखाई देता है, कल उसी की जगह कोई दूसरा मुद्दा ले सकता है। ट्रेंड बदलते हैं, एल्गोरिदम बदलते हैं, प्लेटफॉर्म बदलते हैं और डिजिटल भीड़ का मिजाज भी बदलता रहता है। लेकिन आम आदमी के सवाल इतने क्षणभंगुर नहीं होते। उसके लिए रोजगार का प्रश्न कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा। महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, किसान, सड़क, बिजली, पानी और सुशासन—ये वे मुद्दे हैं जो किसी ‘ट्रेंडिंग’ सूची के मोहताज नहीं।राजनीति की असली धड़कन मोबाइल स्क्रीन पर नहीं, जनता के बीच सुनाई देती है।निस्संदेह सोशल मीडिया ने भारतीय राजनीति की भाषा और रणनीति दोनों बदल दी हैं। राजनीतिक दल अब केवल मंचों से भाषण नहीं देते, बल्कि डिजिटल मंचों पर चौबीसों घंटे संवाद, प्रचार और प्रतिवाद करते हैं। समर्थकों की सक्रियता राजनीतिक ऊर्जा का संकेत हो सकती है और डिजिटल कमजोरी आत्ममंथन का कारण भी। लेकिन कुछ सप्ताह या कुछ महीनों की डिजिटल खामोशी को किसी दल के राजनीतिक अवसान का प्रमाण मान लेना उतना ही जल्दबाज निष्कर्ष है, जितना किसी वायरल पोस्ट को जनादेश समझ लेना।क्योंकि लोकतंत्र में ‘रीच’ से बड़ा शब्द है—विश्वास।
सरकार की सफलता इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उसके समर्थन में कितने पोस्ट हुए और विपक्ष के विरोध में कितने वीडियो वायरल हुए। कसौटी यह होनी चाहिए कि जमीन पर कितना काम हुआ, योजनाओं का लाभ कितने लोगों तक पहुंचा और आम नागरिक अपने जीवन में कितना बदलाव महसूस कर रहा है। उसी तरह विपक्ष की मजबूती केवल तीखे बयानों, संसद के हंगामे या सोशल मीडिया की आक्रामकता से सिद्ध नहीं होती। विपक्ष को जनता के सामने विश्वसनीय विकल्प, स्पष्ट नीति और समाधान की राजनीति रखनी होगी।सियासत में शोर बहुत है, मगर सवाल यह है कि आवाज किसकी है!
सोशल मीडिया का सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है, जब राजनीति वास्तविक जनसरोकारों से हटकर केवल ‘नैरेटिव’ की लड़ाई बन जाती है। किसी अंतरराष्ट्रीय घटना, युद्ध, चुनाव, संवैधानिक प्रश्न, सरकारी नीति या राजनीतिक परिवार को लेकर बहस होना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन लोकतंत्र में वायरल होना सत्य होने की गारंटी नहीं। तथ्य की जगह अफवाह, तर्क की जगह उत्तेजना और प्रमाण की जगह प्रचार बैठ जाए तो डिजिटल लोकतंत्र धीरे-धीरे शोर में बदल जाता है।इसलिए हर वायरल दावे के सामने विवेक का दीप जलाना होगा“जो दिखता है स्क्रीन पर, जरूरी नहीं वही सच हो,जो खामोश है जमीन पर, जरूरी नहीं वह बेअसर हो।”यह भी समझना होगा कि सोशल मीडिया पर आलोचना की तीव्रता में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक है। प्लेटफॉर्म बदलते हैं, दर्शक बदलते हैं, प्राथमिकताएं बदलती हैं और राजनीतिक विमर्श भी नए मुद्दों की ओर मुड़ता है। इसलिए किसी एक समय की डिजिटल स्थिति को वर्षों की राजनीतिक यात्रा का अंतिम फैसला मान लेना विश्लेषण नहीं, अनुमान है।असल प्रश्न यह नहीं कि कौन कितना ट्रेंड कर रहा है।असल प्रश्न यह है कि जनता के मन में कौन कितना जीवित है।यदि सरकार ने अच्छा काम किया है तो उसे डिजिटल शोर से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। उसे अपने काम के आंकड़े, उपलब्धियां और परिणाम जनता के सामने रखने चाहिए। जहां कमी हो, वहां आलोचना को दुश्मनी नहीं, सुधार का अवसर समझना चाहिए। और यदि विपक्ष जनता की आवाज बनने का दावा करता है तो उसे केवल सत्ता की आलोचना नहीं, बल्कि सत्ता का बेहतर विकल्प बनने की क्षमता भी दिखानी होगी।लोकतंत्र में चेहरे बदलते हैं, नारों के अर्थ बदलते हैं, राजनीतिक रणनीतियां बदलती हैं और सोशल मीडिया के मंच भीबदलते रहते हैं। मगर एक चीज नहीं बदलती—जनता की सर्वोच्चता।सोशल मीडिया लोकतंत्र का आईना हो सकता है, लेकिन पूरा चेहरा नहीं। वह आवाज को बुलंद कर सकता है, मगर जनादेश की जगह नहीं ले सकता। वह किसी मुद्दे को दरवाजे तक ला सकता है, लेकिन अंतिम फैसला घर के भीतर बैठा नागरिक ही करता है।इसलिए आज जरूरत इस बात पर जश्न मनाने की नहीं कि किसका सोशल मीडिया कमजोर हुआ और किसका मजबूत। जरूरत इस बात की है कि राजनीति कहीं डिजिटल तमाशे में वास्तविक भारत को तो नहीं भूल रही।क्योंकि सत्ता की असली परीक्षा किसी हैशटैग की ऊंचाई में नहीं, जनता के भरोसे की गहराई में होती है।और वह भरोसा न खरीदा जा सकता है, न ट्रेंड कराया जा सकता है, न किसी एल्गोरिदम से पैदा किया जा सकता है भरोसा कमाना पड़ता है—काम से,विश्वास बचाना पड़ता है—ईमान से,और जनादेश पाना पड़ता है—जनता के बीच जाकर।बहरहाल,लोकतंत्र की सबसे बड़ी ‘रीच’ जनता का दिल है और उसका सबसे शक्तिशाली ‘ट्रेंड’ जनता का विश्वास। जिस दिन राजनीति इस सरल सत्य को समझ लेगी, उस दिन सोशल मीडिया सत्ता का पैमाना नहीं, लोकतंत्र की एक सार्थक आवाज भर रह जाएगा!
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