चंडीगढ़,पांचवा आयाम (राकेश मिश्रा) : 31 वर्षीय सेकेंड जनरेशन उद्यमी और रियल एस्टेट डेवलपर शुभम गुप्ता ने अपनी पहली पुस्तक ‘द डार्क सीक्रेट्स ऑफ रियल एस्टेट, व्हाट द इंडस्ट्री डज़न्ट वॉन्ट बायर्स टू नो’ का चंडीगढ़ प्रेस क्लब में विमोचन किया। इस पुस्तक में देश में प्रॉपर्टी खरीदारों के सामने आने वाली कई ऐसी चुनौतियों के बारे में बताया गया है, जिनकी जानकारी आमतौर पर खरीदारों को नहीं होती। करीब डेढ़ साल में लिखी गई 215 पेज की इस पुस्तक का उद्देश्य खास तौर पर पहली बार घर खरीदने वाले लोगों को प्रॉपर्टी खरीदने से पहले उससे जुड़े कानूनी, तकनीकी और आर्थिक पहलुओं की जानकारी देना है। शुभम ने कहा कि खरीदार अक्सर कई प्रॉपर्टी देखते हैं, बिल्डरों से मिलते हैं और उन्हें आकर्षक सुविधाओं और ऑफरों के बारे में बताया जाता है। लेकिन बड़ी रकम निवेश करने से पहले कौन से सवाल पूछने चाहिए, इसकी जानकारी कई खरीदारों को नहीं होती। उन्होंने कहा, “इस पुस्तक को लिखने का मेरा उद्देश्य घर खरीदने वालों, खासकर पहली बार घर खरीदने वालों को जानकारी देना है, ताकि वे समझ सकें कि प्रॉपर्टी खरीदने से पहले किन बातों पर ध्यान देना चाहिए और कौन से जरूरी सवाल पूछने चाहिए।” शुभम ने पुस्तक में बताया है कि खरीदारों को बिल्डर की प्रोफाइल और उसके पिछले काम का रिकॉर्ड, निर्माण की तकनीकी गुणवत्ता तथा प्रोजेक्ट की कानूनी और नियामक स्थिति की जांच करनी चाहिए। उन्हें रेरा (RERA) रजिस्ट्रेशन और हर तिमाही की प्रगति रिपोर्ट भी देखनी चाहिए। इसके अलावा केवल सेल्स ऑफिस में दिखाई जाने वाली प्रेजेंटेशन पर भरोसा करने के बजाय प्रोजेक्ट साइट का खुद जाकर निरीक्षण करना चाहिए। शुभम ने बताया कि संभावित खरीदारों को निर्माण से जुड़ी तकनीकी जानकारी भी देखनी चाहिए। इसमें प्रोजेक्ट का स्ट्रक्चरल फ्रेमवर्क, आरसीसी निर्माण, एम25 और एम35 जैसे कंक्रीट ग्रेड, सीमेंट और कंक्रीट की गुणवत्ता तथा इस्तेमाल किए गए स्टील की गुणवत्ता शामिल है। उन्होंने कहा, “बिल्डर के सेल्स ऑफिस की लग्जरी और शानदार प्रेजेंटेशन कभी भी सही जांच-पड़ताल का विकल्प नहीं हो सकती। खरीदार को वास्तविक प्रोजेक्ट, उसकी निर्माण गुणवत्ता, दस्तावेज, मंजूरियां और डेवलपर की आर्थिक स्थिति की जांच करनी चाहिए।” लेखक और रियल एस्टेट विशेषज्ञ शुभम ने कहा कि दस्तावेजों की जांच भी बेहद जरूरी है। पुस्तक में खरीदारों को मालिकाना हक और टाइटल रिकॉर्ड, मदर डीड, नॉन-एन्कम्ब्रेंस सर्टिफिकेट, संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, बिल्डर के नाम रजिस्ट्री, लागू खसरा नंबर और जहां जरूरी हो, वहां एग्रीमेंट टू सेल की जांच करने के लिए कहा गया है। उन्होंने खरीदारों को “प्री-लॉन्च कीमत”, सीमित उपलब्धता या बिक्री के दौरान बनाई जाने वाली जल्दबाजी जैसे दावों के आधार पर अकेले फैसला लेने से भी सावधान किया। शुभम ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि कोई चीज रियल एस्टेट है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह अपने आप एक अच्छा निवेश है। खरीदारों को पैसा लगाने से पहले लोकेशन, कानूनी स्थिति, डेवलपर की साख, आर्थिक स्थिति, कीमत और भविष्य की संभावनाओं का आकलन करना चाहिए।” शुभम गुप्ता वर्ष 2018 से रियल एस्टेट क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि सिविल इंजीनियरों और अन्य विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करने तथा डेवलपमेंट और निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं पर स्वतंत्र रिसर्च के माध्यम से उन्होंने यह अनुभव हासिल किया है। रियल एस्टेट क्षेत्र में अधिक पारदर्शिता की जरूरत बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी और बिल्डरों से जुड़े बड़े लेन-देन की जानकारी उचित सार्वजनिक प्लेटफॉर्म के माध्यम से उपलब्ध होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “प्रोजेक्ट से जुड़े पैसों की निगरानी के लिए अधिक पारदर्शिता और मजबूत व्यवस्था की जरूरत है। हमारा उद्देश्य ऐसा रियल एस्टेट सिस्टम बनाना होना चाहिए, जहां लेन-देन पारदर्शी, वैध और जवाबदेह हों और काले धन के लेन-देन की कोई गुंजाइश न रहे।” शुभम ने बताया कि उनकी पुस्तक में खरीदारों को टैक्स, उपलब्ध टैक्स लाभ और रिबेट के बारे में भी जानकारी दी गई है। साथ ही निवेश का फैसला लेने से पहले इन लाभों के लिए अपनी पात्रता की जांच करने की जानकारी भी दी गई है। शुभम ने कहा, “अगर खरीदार सही जानकारी से लैस होंगे और सही सवाल पूछेंगे, तो इससे न केवल उनके व्यक्तिगत हितों की रक्षा होगी, बल्कि एक अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और बेहतर गुणवत्ता वाले रियल एस्टेट उद्योग को बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी।”







