हरियाणा में नगर निगम मेयरों के प्रत्यक्ष चुनाव कराए जाने की व्यवस्था लागू हुए साढ़े सात वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि राज्य के मूल कानून में आज भी मेयर के अप्रत्यक्ष निर्वाचन का प्रावधान जस का तस मौजूद है। इस कानूनी विसंगति को लेकर अब एक बार फिर बहस तेज हो गई है।
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट एवं म्युनिसिपल कानून विशेषज्ञ हेमंत कुमार ने दावा किया है कि हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 की धारा 53 में आज भी भी उल्लेख है कि नगर निगम के आम चुनाव के बाद नव-निर्वाचित सदस्यों (जिन्हें आम तौर पर पार्षद/ काउंसलर जाता है हालांकि ये शब्द हरियाणा नगर निगम कानून में नहीं है) के द्वारा और उनमें से ही मेयर का चुनाव किया जाएगा, जबकि व्यवहार में वर्ष 2018 से मेयरों का प्रत्यक्ष चुनाव कराया जा रहा है।
तीन नए मेयरों ने हाल ही में ली शपथ
गत 28 मई को अक्षिता सैनी (अम्बाला), शामलाल बंसल (पंचकूला) और राजीव जैन (सोनीपत) ने बतौर प्रत्यक्ष निर्वाचित मेयर पद एवं निष्ठा की शपथ ग्रहण की जो शपथ सम्बंधित मंडल-आयुक्तों द्वारा दिलाई गई. इन तीनो के शपथ-ग्रहण समारोहों में नायब सिंह सैनी भी उपस्थित रहे।
इससे पहले गत वर्ष मार्च, 2025 में प्रदेश के आठ अन्य नगर निगमों -फरीदाबाद, गुरुग्राम, हिसार करनाल, मानेसर, पानीपत, रोहतक और यमुनानगर के प्रत्यक्ष निर्वाचित मेयरों का भी पंचकूला में राज्य स्तरीय शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया गया था जिसमें सम्बंधित मंडल-आयुक्तों द्वारा सभी को पद और निष्ठा की शपथ दिलाई गई थी.
2018 में बदली चुनाव प्रणाली, पर कानून की धारा नहीं बदली
हेमंत के अनुसार सितंबर, 2018 में हरियाणा विधानसभा ने मेयर के प्रत्यक्ष चुनाव का मार्ग प्रशस्त करने के लिए संशोधन किया था, लेकिन उसी समय अधिनियम की धारा 53 में आवश्यक परिवर्तन नहीं किया गया।
यही कारण है कि धारा 53 के अनुसार आज भी:
- आम चुनाव के बाद 30 दिनों के भीतर निगम की पहली बैठक बुलाने का प्रावधान है।
- उस बैठक में निर्वाचित न.नि.सदस्यों द्वारा और उनमें से ही मेयर चुने जाने का उल्लेख है।
- चुनाव प्रक्रिया की अध्यक्षता के लिए एक सदस्य को नामित करने का प्रावधान है।
- वोट बराबर होने की स्थिति में ड्रा ऑफ लॉट (लॉटरी सिस्टम) से विजेता तय करने की व्यवस्था भी दर्ज है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार ये सभी प्रावधान प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से मेल नहीं खाते।कानून और नियमों में सीधा टकराव दिलचस्प तथ्य यह है कि नवंबर 2018 में हरियाणा नगर निगम निर्वाचन नियमावली, 1994 के नियम 71 में संशोधन कर स्पष्ट कर दिया गया कि आम चुनाव के बाद पहली बैठक में मंडल आयुक्त सीधे निर्वाचित मेयर और नगर निगम सदस्यों को शपथ दिलाएंगे।यहीं से विवाद पैदा होता है।एक ओर अधिनियम की धारा 53 मेयर के अप्रत्यक्ष निर्वाचन की बात करती है, जबकि दूसरी ओर संशोधित नियम 71 प्रत्यक्ष निर्वाचित मेयर को शपथ दिलाने की व्यवस्था करता है।कानून सर्वोपरि, नियम नहीं’हेमंत का स्पष्ट कानूनी मत है कि सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित किया जा चुका है कि यदि किसी अधिनियम और उसके तहत बनाए गए नियमों में टकराव हो, तो अधिनियम के प्रावधान को ही प्राथमिकता मिलेगी।उनके अनुसार:“विधानसभा द्वारा पारित अधिनियम सर्वोच्च होता है। उसके अंतर्गत बनाए गए नियम उससे ऊपर नहीं हो सकते। इसलिए धारा 53 और नियम 71 के बीच मौजूद विरोधाभास को समाप्त करना आवश्यक है।सरकार और आयोग को कई बार भेजे गए पत्रएडवोकेट हेमंत का दावा है कि उन्होंने पिछले कई वर्षों में अनेक बार राज्य सरकार के शहरी स्थानीय निकाय विभाग और राज्य निर्वाचन आयोग को इस कानूनी विसंगति की ओर ध्यान आकर्षित कराया। इतना ही नहीं, अम्बाला, पंचकूला और सोनीपत के नव-निर्वाचित मेयरों के शपथ ग्रहण से ठीक पहले भी उन्होंने पत्र लिखकर धारा 53 में संशोधन की मांग उठाई थी।उन्होंने यह भी आग्रह किया कि संशोधन को पूर्व प्रभाव (Retrospective Effect) से लागू किया जाए ताकि वर्ष 2018 के बाद हुए सभी प्रत्यक्ष मेयर चुनावों को निर्विवाद वैधानिक आधार मिल सके।हेमंत ने बताया कि हालांकि गत वर्ष दिसम्बर, 2025 में हरियाणा विधानसभा द्वारा प्रदेश के लिए पारित नये म्युनिसिपल कानून नामत: हरियाणा नगर निकाय विधेयक, 2025 में उपरोक्त गड़बड़ी को दूर कर लिया गया हालांकि विधानसभा से पारित होने के बाद प्रदेश के राज्यपाल द्वारा उक्त विधेयक को भारत की राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेजा गया है. बहरहाल, कानून बन कर लागू होने के बावजूद प्रदेश के मौजूदा 11 प्रत्यक्ष निर्वाचित नगर निगम मेयरों के प्रत्यक्ष निर्वाचन को पूर्ण वैधानिक (कानूनी) मान्यता देने लिए वर्ष 1994 कानून की धारा 53 में संशोधन करना आवश्यक है.हरियाणा में गत सवा वर्ष में सभी 11 नगर निगमों के प्रत्यक्ष निर्वाचित मेयर सत्ताधारी भाजपा से हैं, लेकिन किसी ने भी उपरोक्त कानूनी विसंगति को दूर करने के लिए प्रदेश सरकार को नहीं लिखा.






