समय पर इमरजेंसी सीज़ेरियन से मां और बच्चा सुरक्षित, कोकून हॉस्पिटल में सफल डिलीवरी

डीगढ़ : 39 वर्षीय महिला की हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का कोकून हॉस्पिटल, चंडीगढ़ में सफल इलाज किया गया। प्रेग्नेंसी के 37वें सप्ताह में अचानक पानी जैसा तरल पदार्थ निकलने के साथ उन्हें बार-बार खुजली, लालिमा और हाइव्स जैसे रैशेज हुए। जांच में इंट्राहेपेटिक कोलेस्टेसिस ऑफ प्रेग्नेंसी (IHCP) की पुष्टि हुई, जो प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली लिवर की बीमारी है। मरीज का करीब आठ साल पहले सीज़ेरियन हो चुका था और इस प्रेग्नेंसी के दौरान वह लगातार डॉक्टरों की निगरानी में थीं। उनकी पिछली डिलीवरी और मौजूदा स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने दोबारा सीज़ेरियन डिलीवरी की योजना बनाई थी। प्रेग्नेंसी के 37वें सप्ताह में मरीज को अचानक पानी जैसा तरल पदार्थ निकलने लगा, जिससे पानी की थैली फटने की पुष्टि हुई। पहले सीज़ेरियन और लिवर की बीमारी को देखते हुए डॉक्टरों ने तुरंत स्थिति का आकलन किया और मां-बच्चे की सुरक्षा के लिए इमरजेंसी रिपीट सीज़ेरियन करने का फैसला लिया। सर्जरी के दौरान यूट्रस के निचले हिस्से में चिपके हुए ऊतकों (एडहीज़न्स) को सावधानी से अलग किया गया। इसके बाद 2.8 किलो के स्वस्थ बेटे का जन्म हुआ। ऑपरेशन के दौरान कोई बड़ी जटिलता या ज्यादा ब्लीडिंग नहीं हुई। बच्चे को नियमित देखभाल के लिए पीडियाट्रिक टीम को सौंप दिया गया। डिलीवरी के बाद मां को फिर से खुजली, लालिमा और हाइव्स जैसे रैशेज हुए। डॉक्टरों ने संभावित एलर्जिक रिएक्शन की जांच कर एंटीहिस्टामिन और कॉर्टिकोस्टेरॉइड दवाएं दीं। एलर्जी के संभावित कारण का पता लगाने के लिए आगे जांच की सलाह भी दी गई। कोकून हॉस्पिटल, चंडीगढ़ की सीनियर कंसल्टेंट- ऑब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी, डॉ. प्रियंका शर्मा ने कहा, “हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में लगातार निगरानी और समय पर सही फैसला बेहद जरूरी होता है, खासकर जब एक साथ कई जोखिम हों। इस मामले में प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली लिवर की बीमारी, पहले सीज़ेरियन और 37वें सप्ताह में पानी की थैली फटने के कारण हमें स्थिति का तुरंत दोबारा आकलन करना पड़ा और मां-बच्चे की सुरक्षा के लिए इमरजेंसी सीज़ेरियन का फैसला लिया गया। इस पूरी प्रक्रिया में ऑब्स्टेट्रिक, एनेस्थीसिया और नियोनेटल टीम के बीच बेहतर तालमेल महत्वपूर्ण रहा। डिलीवरी के बाद मां को दोबारा खुजली, लालिमा और हाइव्स जैसे रैशेज हुए, जिनका उचित इलाज किया गया और उनकी स्थिति स्थिर होने तक निगरानी रखी गई।” उपचार और लगातार निगरानी के बाद मरीज की स्थिति स्थिर रही। सर्जरी के तीसरे दिन उन्हें आवश्यक दवाओं और फॉलो-अप संबंधी सलाह के साथ अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। उन्हें आगे एलर्जी संबंधी जांच कराने और लक्षण दोबारा दिखाई देने पर तुरंत डॉक्टरों को जानकारी देने की सलाह दी गई। कोकून हॉस्पिटल, चंडीगढ़ के क्लस्टर हेड, डॉ. दिलशाद खान ने कहा, “हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में स्थिति कभी भी बदल सकती है, इसलिए समय पर सही फैसला लेना जरूरी होता है। इस मामले में 37वें सप्ताह में पानी की थैली फटने के बाद मरीज के पहले सीज़ेरियन और प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली लिवर की बीमारी को ध्यान में रखते हुए डिलीवरी प्लान का तुरंत दोबारा आकलन किया गया। मां और बच्चे की सुरक्षा को देखते हुए समय पर इमरजेंसी सीज़ेरियन का फैसला लिया गया। कोकून हॉस्पिटल्स में ऐसी जटिल परिस्थितियों से निपटने के लिए अनुभवी डॉक्टरों, आधुनिक सुविधाओं और प्रशिक्षित मेडिकल टीम की व्यवस्था है। हमारा उद्देश्य हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी वाली महिलाओं को हर स्तर पर विशेषज्ञ और सुरक्षित देखभाल उपलब्ध कराना है।” यह मामला हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी में किसी भी बदलाव को समय पर पहचानने और जरूरत के अनुसार तुरंत सही चिकित्सकीय फैसला लेने के महत्व को दर्शाता है। मरीज की देखभाल में ऑब्स्टेट्रिक, एनेस्थीसिया, नियोनेटल और नर्सिंग टीम के बीच बेहतर तालमेल महत्वपूर्ण रहा। कोकून हॉस्पिटल, चंडीगढ़ में मैटरनिटी और ऑब्स्टेट्रिक केयर के साथ हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी का इलाज, बच्चे की निगरानी और नवजात शिशु की देखभाल जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां मां और बच्चे दोनों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उपचार और देखभाल की जाती है।

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