ऋतुओं की रानी मानसून, चुनौती, राहत व चेतावनी

दुनियाँ को मालूम है कि भारतवर्ष में हर दो महीने के अंत के साथ नई ऋतु का आगमन हो जाया करता है।क्योंकि हमारे देश में एक – दो – तीन नहीं बल्कि कुल छह ऋतुएँ होती हैं। इसमें ऋतुओं का राजा वसंत और उसकी रानी वर्षा है। इस वक्त मानसून अर्थात वर्षा ऋतु अपने प्रारम्भ में अपनी अनुपम छटा विखेर रही है। पूरे वर्ष में यह मानसून केवल एक ऋतु नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका, कृषि, अर्थव्यवस्था और जीवन का आधार भी है। इस वर्ष जुलाई के शुरुआती दिनों में मानसून ने तेज़ी पकड़ी है। कई राज्यों में भारी वर्षा हो रही है, तो कहीं बाढ़ और जलभराव जैसी समस्याएँ सामने आ रही हैं तो कहीं सूखा मानसून से त्राहिमाम की स्थिति है। कहीं किसान अच्छी वर्षा की उम्मीद में राहत महसूस कर रहे हैं तो कहीं शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जल निकासी की ढुलमूल व्यवस्था जनजीवन को चिंता में डाला हुआ है। उधर ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों के नुकसान की आशंका ने खासकर किसानों को डराकर रखा हुआ है।मानसून की विविधताओं का ऐसा स्वरूप स्पष्ट संकेत देता है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की भी बड़ी चुनौती है! कभी लंबे समय तक सूखा, तो कभी कुछ ही दिनों में अत्यधिक वर्षा—ऐसा असामान्य मौसम चक्र कृषि उत्पादन, पेयजल व्यवस्था और आपदा प्रबंधन पर गहरा प्रभाव डाल रहा है। मौसम की इस गंभीर चेतावनी को लेकर यदि समय रहते प्रभावी नीतियाँ नहीं अपनाई जाती , तो इसका असर खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था दोनों पर असर डाल जाता है। पूरी धरती जानती है किभारत देश की लगभग आधी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। ऐसे में मानसून की अनिश्चितता किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित करती है। सरकार द्वारा खरीफ फसलों की निगरानी, वैकल्पिक फसल योजना, बीमा योजना व राहत के उपाय निश्चित रूप से आवश्यक कदम हैं, लेकिन इन योजनाओं का लाभ अंतिम किसान तक समय पर पहुँचना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।दूसरी ओर, शहरों की स्थिति भी चिंताजनक है। हर वर्ष कुछ घंटों की बारिश में सड़कें जलमग्न हो जाती है फलस्वरूप यातायात बुरी तरह से प्रभावित होती है। यहाँ तक कि कई अहम् रास्तों पर आवागमन ठप हो जाता है और नागरिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। यह केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि शहरी नियोजन और प्रशासनिक तैयारी की भी परीक्षा मानी जाती है। ऐसे में स्मार्ट शहरों या इस कतार में स्मार्ट बनने की होड़ में शामिल शहरों की अवधारणा तभी सार्थक होगी, जब जल निकासी, वर्षा जल संचयन और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता के साथ अपनी कार्यशैली में प्रमुखता के साथ जगह दी जाए। इसकासमाधान सिर्फ सरकारी राहत के पैकेजों में नहीं, अपितु दीर्घकालिक योजनाओं के क्रियान्वयन में निहित है। जल संरक्षण, नदियों और तालाबों का पुनर्जीवन, वैज्ञानिक कृषि पद्धतियाँ, मौसम पूर्वानुमान की सटीक जानकारी और स्थानीय स्तर पर आपदा प्रबंधन को मजबूत करना समय की नितांत माँग है। साथ ही, नागरिकों को भी पर्यावरण संरक्षण और जल संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के प्रति जागरूक होकर अपनी भूमिका अदा करने की जरुरत है ।भारत जैसे कृषि प्रधान देश के हित में मानसून एक बड़ा वरदान है, परन्तु मानसून के विविध रंगों और तरंगों को लेकर हमारी जवाबदेही कहती है कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाए बिना समग्र विकास कतई टिकाऊ नहीं हो सकता। इस प्रकार से हमें स्वीकार करना चाहिए कि सरकार, प्रशासन, वैज्ञानिक समुदाय और समाज मिलकर यदि दूरदर्शी रणनीति अपनाएँ, तो मानसून केवल संकट का प्रतीक नहीं, बल्कि समृद्धि का आधार भी निश्चित ही बन सकता

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