अपनी दुनिया का केंद्र बनें “सरस्वती धानेश्वर

पंचकूला (नेहा पांडेय ):जीवन का एक, बहुत बड़ा विरोधाभास यह है कि हम स्वयं को भूलकर दूसरों के लिए जीते-जीते एक दिन यह भूल जाते हैं कि हमारे अपने अस्तित्व का भी कोई मूल्य है। हम लोगों की अपेक्षाओं, उनकी स्वीकृतियों और उनकी प्रतिक्रियाओं को इतना महत्व देने लगते हैं कि अपनी इच्छाओं, अपने सपनों और अपने मन की आवाज़ को सुनना ही छोड़ देते हैं।बचपन से हमें दूसरों का ध्यान रखना सिखाया जाता है। यह सीख आवश्यक भी है, क्योंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब दूसरों की खुशी के लिए जीते-जीते हम अपनी खुशी को महत्वहीन मान लेते हैं। हम अपने जीवन के दर्शक बन जाते हैं और दूसरों को उसका केंद्र बना देते हैं।अपनी दुनिया का केंद्र बनने का अर्थ अहंकारी होना नहीं है। सिर्फ इतना कि स्वयं के अस्तित्व को स्वीकार करना।यह समझना कि आपके भीतर भी एक मन है, कुछ सपने हैं, कुछ ऐसी इच्छाएँ हैं जिन्हें जीने का अधिकार केवल आपको है।अक्सर हम अपने दुखों का कारण परिस्थितियों को मानते हैं, जबकि कई बार दुख का सबसे बड़ा कारण यह होता है कि हमने अपने जीवन की चाबी दूसरों के हाथों में सौंप दी होती है। कोई प्रशंसा कर दे तो हम प्रसन्न हो जाते हैं, कोई अनदेखा कर दे तो हमारा आत्मविश्वास डगमगा जाता है। यह स्थिति हमें भीतर से निर्भर और कमजोर बनाती है।स्वयं को अपनी दुनिया का केंद्र बनाने का अर्थ है अपने भीतर लौटना, खुद को खोजना,अपने आप से पूछना कि मैं वास्तव में कौन हूँ? मुझे क्या अच्छा लगता है? मेरी खुशियों का स्रोत क्या है?इन प्रश्नों के उत्तर बाहर नहीं मिलते,इनके उत्तर हमारे भीतर ही छिपे होते हैं।यह भी सच है कि जो व्यक्ति स्वयं का सम्मान नहीं करता, दुनिया भी धीरे-धीरे उसका सम्मान करना छोड़ देती है। आत्मसम्मान कोई प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक मौन स्वीकृति है कि मैं भी उतना ही महत्वपूर्ण हूँ जितना कोई और। मेरा समय, मेरी ऊर्जा और मेरी संवेदनाएँ भी मूल्यवान हैं।संबंध जीवन को सुंदर बनाते हैं, लेकिन किसी भी संबंध की पहली शर्त यह है कि हम स्वयं से जुड़े रहें। जो व्यक्ति स्वयं से कट जाता है, वह धीरे-धीरे हर संबंध में स्वयं को खोने लगता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपने भीतर एक मजबूत केंद्र विकसित कर लेता है, वह संबंधों को बोझ नहीं, बल्कि सौभाग्य की तरह जीता है।और दुनिया का केंद्र बनने के लिए किसी पद, प्रसिद्धि या उपलब्धि की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए केवल इतना साहस चाहिए कि आप स्वयं को अपने जीवन की कहानी का मुख्य पात्र मानें। दूसरों के लिए जीना सुंदर है, लेकिन स्वयं को भुलाकर जीना नहीं।अंततः जीवन का संतुलन वहीं से शुरू होता है जहाँ हम स्वयं को स्वीकार करते हैं। जब हम अपनी दुनिया के केंद्र में खड़े होते हैं, तब हम दूसरों से प्रेम भी बेहतर कर पाते हैं, उनके लिए उपयोगी भी बन पाते हैं और स्वयं के प्रति ईमानदार भी रह पाते हैं।क्योंकि जो व्यक्ति स्वयं को पा लेता है, उसे दुनिया में अपना स्थान खोजने के लिए भटकना नहीं पड़ता।

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