आस्था की शक्ति भक्ति : चढ़ावे की सुरक्षा पारदर्शी – अभेद्य निगरानी

भारतवर्ष के लगभग सभी प्राचीन – प्रसिद्ध और प्रमुख देवी – देवताओं मंदिरों में दानराशि / चढ़ावे की समुचित अभेद्य निगरानी ने वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय – राष्ट्रीय स्तर के विमर्श और बहस को उत्पन्न किया हुआ है! इस लक्ष्य में संकल्पित बेजोड़ आस्था, शीशे जैसी पारदर्शिता एवं निष्कपट जवाबदेही जैसी त्रिकोणीय विन्दुओं को संतुलित निर्विकार – आकार देना बड़ी चुनौती बन गया प्रतीत होता है! क्योंकिआस्था की रक्षा का मार्ग देवी – देवताओं के सिद्ध – प्रसिद्ध मंदिरों में चढ़ावे की अभेद्य सुरक्षा व निगरानी के साथ सम्बद्ध अनुयायी पदाधिकारियों की अचूक जवाबदेही पर पूरी तरह निर्भर होता है!देश – विदेश में सनातन – वैदिक संस्कृति का पर्याय मंदिर सिर्फ और केवल ध्यान – साधना व पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं , अपितु करोड़ों आस्तिक भक्तजनों की निश्छल आस्था, अनूठी संस्कृति और सभ्य सामाजिक जीवन के महत्वपूर्ण आधार भी अटूट रूप से विश्वसनीय होते हैं!हमारे इस वैदिक आर्य देश में इस आस्था के दैविक स्थलों पर प्रतिदिन – प्रतिवर्ष लाखों – करोड़ों का ज्ञात व गुप्त चढ़ावा चढ़ाया जाता है! उक्त चढ़ावे को श्रद्धालुओं की श्रद्धा – निष्ठा और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में यदि चढ़ावे के प्रबंधन, उपयोग और लेखा-जोखा को लेकर प्रश्न उठे हैं, तो यह सिर्फ सामान्य कोई आर्थिक विषय नहीं रह जाता, अपितु सार्वजनिक आस्था और विश्वास का गंभीर मुद्दा भी है!कुछ समय से देश- प्रदेश के प्रमुख मंदिरों में दान की राशि के प्रबंधन को लेकर निगरानी और ऑडिट की मांग तीव्रता के साथ प्रबल होता स्पष्ट रूप से दिख रहा है और सुना भी जा रहा है जिसका प्रमुख कारण धार्मिक संस्थाओं के पास इकठ्ठे होने वाले चढ़ावे आदि दान – धन को सार्वजनिक हितों से जुड़ा होना ही है। क्योंकि अंततः ऐसे श्रोत तो सभ्य समाज ही होते हैं ना! अतः उक्त कोष / भंडार का किसी जनहित उद्देश्य से समुचित निकासी और उसका सदुपयोग भी नितांत पारदर्शी, नियम – शर्तों के अनुरूप, तर्क संगत व सम्मत और जनहितकारी सिद्ध होना चाहिए। अगर इसमें कहीं अनियमितता, भ्रष्टाचार या वित्तीय कुप्रबंधन की आशंका मात्र प्रतीत होता है तो उसकी तुरंत निष्पक्ष जांच – पड़ताल और अपेक्षित न्यायिक कार्यवाही जनतांत्रिक व्यवस्था का स्वाभाविक दायित्व मूलतः अनिवार्य हो जाता है।चंदे – चढ़ावे की निगरानी और आस्था में हस्तक्षेप दोनों अलग-अलग विन्दु हैं,यह सर्वसम्मति से स्वीकारणीय होना चाहिए। कारण किसी मंदिर की धार्मिक परंपराओं, पूजा-पद्धतियों या धार्मिक स्वयत्तता – स्वतंत्रता में हस्तक्षेप शोभा नहीं देता परन्तु वित्तीय उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना वैधानिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही है। हमारा विश्व में अतुलनीय संविधान भी धार्मिक स्वतंत्रता – स्वयत्तता में कानून के शासन एवं सार्वजनिक उत्तरदायित्व को भेदभाव रहित बराबर का दर्जा देता है! उल्लेखनीय है कि देवी – देवताओं केमंदिरों के कुबेर भंडार में दान – द्रव्य नकदी तक सीमित नहीं बल्कि उसमें सोना, चांदी, हीरा – जवाहरात, आभूषण, भूमि, संपत्ति आदि अनेकों अन्य मूल्यवान वस्तुएं सम्मिलित होती हैं। ऐसे में आधुनिकम डिजिटल लेखांकन, नियमित तकनीक के साथ – सहयोग से स्वतंत्र ऑडिट, सरर्वेलेंस कैमरा की निगरानी, इलेक्ट्रॉनिक दान प्रणाली एवं सार्वजनिक वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट जैसी व्यवस्थाएं विश्वास के पटल को और भी ज्यादा पुख्ता रूप दे सकती है, इसमें कोई संशय या दो राय नहीं है। पारदर्शिता रहने से आम व खास श्रद्धालुओं का भरोसा भी अडिग रहता है। दान – धाम का वास्तविक उपयोग जनहित में वैदिक -धार्मिक अनुष्ठाणों में, गंगा – गौ – गीता हेतु,जरुरत मंदों – मुफलिसों के कल्याण हेतु के साथ – साथ सामाजिक संकट में,शिक्षा-स्वास्थ्य आदि क्षेत्र सहित धर्मशालाओं व सामाजिक कल्याण जैसे सर्व जन हिताय के अनुपम पुण्य कार्यों में अधिक प्रभावी ढंग संभव हो सकता है। यद्यपि इसकी महत्ता उतनी ही है जितनी समान निष्पक्ष निगरानी की निर्णिमेष – निष्पक्ष प्रक्रिया।बहरहाल, समय रहते अपेक्षित पारदर्शिता , नियमावली व सिद्धांत सकल धार्मिक एवं धर्मार्थ संस्थानों पर समान रूप से लागू होना नितांत जरुरी पहल परिलक्षित हो रहा है। ऐसे में एक बड़ी बहस का विषय यह भी कि किसी समुदाय विशेष या वर्ग विशेष की संस्थाओं – संस्थानों को लेकर अलग – अलग मापदंड – व्यवस्था आदि का होना जनतंत्र में समानता की भावना के अनुरूप कतई नहीं! अतः कानून का मूल – आधार समानता व निष्पक्षता सर्वभौंमिक रूप से आत्मसात हों! इसमें लोकतंत्र की सत्ता और जत्था (शासन – प्रशासन )की भूमिका भी सटीक एवं संतुलित हों! किसी राज्य का उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं का संचालन आदि करना सुनिश्चित नहीं,अपितु यह सुनिश्चित करना तय होना चाहिए कि सार्वजनिक दान – खाते का दुरुपयोग कतई न होने पाए तथा वित्तीय प्रक्रियाएं पूर्ण रूपेण विधिसम्मत क्रियान्वित हो। यथा समय अपेक्षित त्वरित स्वतंत्र लेखा-परीक्षण, नियामकीय निरीक्षण और शिकायत निवारण की पारदर्शी व्यवस्था तटस्थ रूप से धरातल पर कायम हो।इसमें सम्बद्ध समाज एवं देवत्व मंदिर प्रबंधन समितियों की भी बड़ी जिम्मेदारी है। श्रद्धालुओं के विश्वास और अटूट आस्था की रक्षा न सिर्फ धार्मिक प्रवचनों से, अपितु ईमानदार प्रशासनिक क्रिया – कलाप से भी बेहतर साबित हो सकती है । देवत्व मंदिर के संरक्षक स्वयं स्वैच्छिक पारदर्शिता वाली जीवन शैली अंगीकार करें। बिना किसी लागलपेट के समय पर आय-व्यय आदि का ब्यौरा सुस्पष्ट करते रहें जिसमें आधुनिकतम वित्तीय प्रबंधन को प्राथमिकता दें , तो निश्चित ही किसी प्रकार के बाहरी विवादों की संभावना शून्यतम के माफिक कमतर हो जाएगी।निष्कर्षतः मानना होगा कि आस्था और जवाबदेही एक-दूसरे के कतई विरोधी नहीं, अपितु पूरक हैं। जहां आस्था श्रद्धा से यथाशक्ति दान – दक्षिणा हेतु उत्साहित व प्रेरित करती है, वहीं पारदर्शिता आस्था को स्थायित्व प्रदान कर धार्मिक भावनाओं को निरंकुशता प्रदान करती है। लब्बोलूबाव स्थिति यही प्रतीत होता है कि धार्मिक स्थानों का मान – मर्यादा व सम्मान तभी जीवंत रहेगा जब श्रद्धालुओं का अडिग विश्वास यह बोलेगा कि उनका प्रत्येक अंशदान देवी – देवताओं के साक्षी में पूरी ईमानदारी के साथ जनहित के कल्याण की भावना से ओतप्रोत रहेगा।अंततोगत्वा, भारत की प्राचीन वैदिक धार्मिक परंपरा की गरिमा व गौरव तब तक अक्षुण्ण संभव नहीं जब तक सत्- चित – आनंद को आत्मसात करते हुए निष्कपट भाव से आत्मीय शुद्धता व सुचिता के साथ उसकी विशुद्ध आधारशिला एवं अटल विश्वास को दूध का दूध पानी का पानी जैसी अमूल्य पारदर्शिता व जवाबदेही को सुशासन के बल पर प्रतिष्ठापित कर सुदृढ़ता प्रदान ना कर दिया जाता!

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