अग्रिम जमानत खारिज होने पर सरेंडर का दबाव नहीं Anticipatory Bail Rejection Rules को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जो कानूनी गलियारों में चर्चा का विषय बन गया है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई अदालत किसी अभियुक्त की अग्रिम जमानत याचिका को नामंजूर करती है, तो वह उसे ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
झारखंड हाईकोर्ट के आदेश पर शीर्ष अदालत की आपत्ति Anticipatory Bail Rejection Rules का यह मामला तब सामने आया जब झारखंड हाईकोर्ट ने धोखाधड़ी और जालसाजी के एक आरोपित की जमानत याचिका खारिज करते हुए उसे सरेंडर करने का आदेश दे दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश को क्षेत्राधिकार से बाहर बताते हुए कहा कि अदालत के पास याचिका खारिज करने की शक्ति तो है, लेकिन सरेंडर का निर्देश देना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी सीमाएं Anticipatory Bail Rejection Rules के तहत यह स्पष्ट किया गया है कि किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को केवल इसलिए सीमित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी जमानत याचिका खारिज हुई है। मामला आईपीसी की धारा 420, 467 और 120बी जैसी गंभीर धाराओं से जुड़ा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘अनिवार्य सरेंडर’ का आदेश कानूनी रूप से वैध नहीं है।
सतेंद्र कुमार अंतिल मामले का दिया गया हवाला Anticipatory Bail Rejection Rules की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा दिया गया निर्देश पूरी तरह से क्षेत्राधिकार विहीन था। झारखंड हाईकोर्ट ने सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई मामले का उल्लेख किया था, जिसे शीर्ष अदालत ने इस संदर्भ में गलत पाया। यह फैसला अब भविष्य में जमानत याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा।


