विकसित भारत–ग्राम रोजगार आजीविका मिशन गारंटी (VB-G RAM G) योजना : सफल क्रियान्वयन ही सफलता की असली कसौटी

ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने विकसित भारत–ग्राम रोजगार आजीविका मिशन गारंटी (VB-G RAM G) अधिनियम गत दिवस 1 जुलाई से लागू कर दिया! यह व्यवस्था पूर्ववर्ती मनरेगा के स्थान पर लाई गई है। इसके तहत पात्र ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में पिछले मनरेगा के 100 दिनों की जगह 125 दिनों के वैधानिक रोजगार की गारंटी देने का प्रावधान किया है! केंद्र सरकार का विश्वास है कि यह सिर्फ और केवल रोजगार उपलब्ध कराने की योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण विकास, उत्पादक परिसंपत्तियों के निर्माण और वर्ष 2047 ई.तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा और दशा को वास्तविक गति देने वाला व्यापक कार्यक्रम है! इसके लिए केंद्र सरकार ने मनरेगा के तहत जहाँ वित्त वर्ष 2025-26 में 30,000 करोड़ का बजट दिया था वहीं अब इस नये नाम की योजना के लिए वित्त वर्ष 2026-27 में रिकॉर्ड 95,692.31 करोड़ रूपये भारी – भरकम बजटीय प्रावधान भी किया है! यहाँ सबसे उल्लेखनीय पहलू यह है कि
किसी भी नई योजना की सफलता केवल उसके उद्देश्यों से नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन से तय होती है। यही कारण है कि इस योजना को लेकर जितनी उम्मीदें हैं, उतने ही गंभीर प्रश्न भी उठ रहे हैं जो लाजिमी भी है! इसमें सर्व प्रथम
चुनौती संक्रमण संक्रांति (Transition) की है !

मनरेगा (महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम ) जो कि 2 फरवरी 2006 ई. को लागू हुआ था। प्रारम्भ में इसे ” नरेगा ” (NREGA) कहा जाता था, पर 2 अक्टूबर 2009ई. को इसका नाम बदलकर मनरेगा(MGNREGA) कर दिया गया! बहरहाल करीब दो दशकों तक चली मनरेगा व्यवस्था के स्थान पर नई प्रणाली लागू करना – कराना कतई आसान काम नहीं है! लाखों जॉब कार्ड धारकों, ग्राम पंचायतों, तकनीकी कर्मचारियों और प्रशासनिक ढांचे को नई कार्यप्रणाली के अनुरूप ढालना होगा। सरकार ने मौजूदा जॉब कार्डों को मान्य रखने और चल रहे कार्यों को जारी रखने की भी बात कही है, लेकिन वास्तविक स्तर पर यह परिवर्तन कितना सहज होगा, यह आने वाले महीनों से स्पष्ट होने लगेगा!

दूसरी तगड़ी चुनौती राज्यों के साथ समन्वय की क्योंकि ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों का अधिकांश क्रियान्वयन राज्य सरकारों और पंचायतों के माध्यम से होता है! यदि केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय साझेदारी, प्रशासनिक जिम्मेदारियों और कार्य चयन को लेकर कदाचित मतभेद उत्पन्न होते हैं, तो योजना का उद्देश्य उलट – प्रभावित ( दुष्प्रभावित ) भी हो सकता है!

तीसरा, वित्तीय अनुशासन और समय पर भुगतान का महत्वपूर्ण प्रश्न भी है! ग्रामीण मजदूरों के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता समय पर मजदूरी प्राप्त करना है। यदि भुगतान में देरी हुई, तकनीकी बाधाएँ आईं या ऑनलाइन प्रणाली में समस्याएँ आदि बनी रहीं, तो योजना के प्रति विश्वास के डोर कमज़ोर भी पड़ सकते हैं!

चौथी चुनौती लोकतंत्र के समक्ष पारदर्शिता की है! पूर्ववर्ती व्यवस्था में भी कथित फर्जी जॉब कार्ड, अपूर्ण कार्य, भ्रष्टाचार तथा कागजी प्रगति जैसे आरोप – प्रत्यारोप समय-समय पर सामने आते रहे! नई योजना में डिजिटल निगरानी, सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit), जियो-टैगिंग और सार्वजनिक जवाबदेही को और मजबूत बनाना होगा ताकि प्रत्येक रुपये का लाभ वास्तविक पात्र तक सहजता के साथ पहुँच पाए!

पाँचवीं और रोजगारोंन्मूखी चुनौती इस जी-राम-जी रोजगार की गुणवत्ता से जुड़ी है! फ़र्ज करें कि यदि योजना केवल मजदूरी वितरण तक सीमित रह गई तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव सीमित रह जायेगा!इसके विपरीत यदि जल संरक्षण, सिंचाई, ग्रामीण सड़क, कृषि अवसंरचना, वृक्षारोपण और सामुदायिक परिसंपत्तियों का निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विषय को प्राथमिकता मिली , तो संशय नहीं कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की उत्पादक क्षमता बढ़ाने में निश्चित ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है!

राजनीतिक स्तर पर भी यह योजना बहस का विषय बनी हुई है! विपक्ष का आरोप है कि नई व्यवस्था से ग्रामीण रोजगार के अधिकार और राज्यों की भूमिका प्रभावित हो सकती है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि यह मनरेगा का उन्नत और अधिक प्रभावी स्वरूप है!लोकतंत्र में ऐसी बहस स्वाभाविक है, किंतु अंतिम मूल्यांकन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं बल्कि धरातल पर मिलने वाले परिणामों से होगा! आकलन है कि इसके लिए ग्राम पंचायतों की क्षमता बढ़ाना भी अत्यंत आवश्यक होगा! यदि स्थानीय निकायों को पर्याप्त तकनीकी सहयोग, प्रशिक्षित मानव संसाधन और आधुनिक डिजिटल उपकरण उपलब्ध नहीं कराए गए, तो योजना की गति प्रभावित हो सकती है! साथ ही सामाजिक अंकेक्षण को केवल औपचारिक प्रक्रिया न बनाकर जनभागीदारी का प्रभावी माध्यम बनाना होगा!

महिलाओं, अनुसूचित जाति-जनजाति, भूमिहीन मजदूरों और गरीब परिवारों की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करना भी योजना की सफलता का प्रमुख रूप से आधारभूत आयाम होगा! यदि यह योजना ग्रामीण समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक प्रभावी रूप से पहुँचती है, तभी इसका सामाजिक उद्देश्य ( अंत्योदय ) पूरा माना जाएगा!

यह भी आवश्यक है कि योजना को कृषि, स्वयं सहायता समूहों, कौशल विकास, ग्रामीण उद्यमिता और डिजिटल सेवाओं से जोड़ा जाए। इससे ग्रामीण परिवार केवल अस्थायी मजदूरी पर निर्भर न रहकर स्थायी आय के स्रोत भी विकसित कर सकेंगे!
निष्कर्षतः विकसित भारत–जी राम जी योजना भारत के ग्रामीण विकास की दिशा में एक बड़ा नीतिगत परिवर्तन प्रतीत जरूर होता है! इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या यह पारदर्शी, समयबद्ध, भ्रष्टाचार-मुक्त और जनकेंद्रित तरीके से लागू हो पाती है! यदि सरकार, राज्य सरकारें, पंचायतें और स्थानीय समुदाय मिलकर इस योजना को ईमानदारी से लागू करते हैं, तो यह ग्रामीण भारत के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है! लेकिन यदि क्रियान्वयन कमजोर रहा, भुगतान में देरी हुई, पारदर्शिता प्रभावित हुई या राजनीतिक टकराव हावी रहा, तो इसके घोषित उद्देश्य अधूरे रह सकते हैं!अंततः कह सकते हैं कि विकसित भारत–ग्राम रोजगार आजीविका मिशन गारंटी (VB-G RAM G) योजना भारत के ग्रामीण विकास की दिशा में एक बड़ा नीतिगत परिवर्तन है! शाश्वत सत्य बस यही है कि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या यह पारदर्शी, समयबद्ध, भ्रष्टाचार-मुक्त और जनकेंद्रित तरीके से लागू हो पाती है या क्या ! यदि सरकार, राज्य सरकारें, पंचायतें और स्थानीय समुदाय मिलकर इस योजना को ईमानदारी से लागू करते हैं, तो यह ग्रामीण भारत के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है! लेकिन,यदि क्रियान्वयन कमजोर रहा, भुगतान में देरी हुई, पारदर्शिता प्रभावित हुई या राजनीतिक टकराव हावी रहा, तो इसके घोषित उद्देश्य अधूरे रह सकते हैं! किवदन्ति है कि
योजनाएँ तभी सफल होती हैं जब वह कागज़ से निकलकर आम नागरिक के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाएँ!विकसित भारत की यात्रा भी तभी सार्थक होगी जब उसका सबसे बड़ा लाभ ग्रामीण भारत के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचेगा!

⚡ SHARE THIS POST
  • Related Posts

    ट्राई सिटी : क्राई सिटी

    रियल एस्टेट क्षेत्र में निवेश बढ़ने से संपत्तियों की कीमतें आम लोगों की पहुंच से बाहर हो रही हैं! युवा वर्ग, नौकरीपेशा लोग और नए परिवार किराए के मकानों पर…

    योगाभ्यास से बुजुर्ग शारीरिक स्वास्थ्य के साथ सामाजिक और भावनात्मक रूप से बनेंगे  सशक्त : प्रोफेसर सतीश गंधर्व

    लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान द्वारा स्थापित संस्थाओं का सम्मान और उनके आदेशों का पालन प्रत्येक सरकारी संस्था की सर्वोच्च जिम्मेदारी होती है। जब कोई प्रशासनिक निकाय न्यायालय के निर्देश की…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *